क्षेत्र: Jewar Airport के आसपास के प्रभावित गाँव
यह कोई संयोग नहीं है।
यह कोई प्रशासनिक चूक भी नहीं है।
यह एक सोची-समझी प्रक्रिया है, जिसे विकास का नाम देकर Jewar Airport के आसपास के गाँवों की ज़मीन को सेक्टरों के नाम पर कम रेट पर अधिग्रहण किया जा रहा है।
किसानों से ज़मीन बेहद सस्ते दामों पर ली जा रही है। और इस अन्याय पर भी ताला नहीं लगता—उसी ज़मीन में से 7 प्रतिशत प्लॉट के नाम पर कटौती कर ली जाती है। सवाल यह है कि जब ज़मीन हमारी है, तो उसका एक हिस्सा “वापस” पाने के लिए हमें ही कीमत क्यों चुकानी पड़ रही है?
हक़ीक़त यह है कि अपनी ही ज़मीन का हिस्सा वापस पाने के लिए किसानों को रिश्वत देने पर मजबूर किया जा रहा है। इसके बाद भी कोई भरोसा नहीं—न समय तय है, न स्थान तय है—कि वह प्लॉट कब मिलेगा, कहाँ मिलेगा, या मिलेगा भी या नहीं।
आज Jewar Airport क्षेत्र के किसान अपने हक़ के उसी 7 प्रतिशत प्लॉट के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं। हालात ऐसे बना दिए गए हैं मानो किसान अपना ही हक़ भीख में माँग रहा हो।
मुआवज़ा: असली सवाल “कितना?”
कहा जाता है कि किसानों को मुआवज़ा दिया गया है।
लेकिन असली सवाल यह है—कितना?
आज के बाज़ार भाव को देखें तो एक किसान अपनी एक बीघा ज़मीन बेचकर न तो अपना रोज़गार दोबारा खड़ा कर सकता है, और न ही अपने परिवार के रहने के लिए 100 वर्ग मीटर का एक छोटा सा प्लॉट खरीद सकता है।
तो फिर इसे विकास कहा जाए या सरकार और YEIDA की खुली दादागिरी?
ज़मीन चली गई।
आमदनी चली गई।
और बदले में मिला ऐसा मुआवज़ा, जो बढ़ती महँगाई के सामने कुछ ही वर्षों में बेअसर हो जाएगा।
YEIDA का दबाव और सिस्टम की सच्चाई
YEIDA की दादागिरी सिर्फ़ ज़मीन लेने तक सीमित नहीं है। यह पूरे तंत्र का दबाव है।
किसान डर या मजबूरी में फ़ाइल लगाता है, सहमति भी दे देता है। इसके बाद “सरकारी प्रक्रिया” के नाम पर अनुमति वाले काग़ज़ों पर हस्ताक्षर करवाकर उसे दो-दो महीने तक दफ्तरों के चक्कर कटवाए जाते हैं।
यह देरी संयोग नहीं है।
यह देरी इसलिए होती है ताकि प्राधिकरण के भीतर बैठे कुछ लोग एजेंटों के साथ मिलीभगत कर सकें, कमीशन तय हो सके और मुआवज़े की रकम में उनकी भी हिस्सेदारी बन सके।
सवाल यह है कि जब ज़मीन लेनी ही है, तो किसानों के साथ यह मानसिक उत्पीड़न (harassment) क्यों?
अगर नीति साफ़ है, मंशा साफ़ है, तो यह दिखावा क्यों?
सबसे अहम चेतावनी
यह साफ़ और दोटूक शब्दों में दर्ज किया जाना चाहिए कि अगर अर्जन (अधिग्रहण) के नाम पर ज़मीन रिकॉर्ड में डालकर ज़बरन कब्ज़ा लेने की कोशिश की गई, तो उसे किसी भी हालत में स्वीकार नहीं किया जाएगा।
इसे न तो सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया माना जाएगा और न ही कानूनी औपचारिकता—बल्कि यह किसानों के अधिकारों पर सीधा हमला माना जाएगा।
काग़ज़ों में ज़मीन दर्ज कर लेना और ज़मीन पर हक़ जता लेना—ये दो अलग बातें हैं।
ज़मीन पर हक़ तब तक नहीं बनता, जब तक किसान की स्वेच्छा और सहमति न हो।
इतिहास की चेतावनी
इतिहास गवाह है—ज़मीन के लिए ही महाभारत हुई थी।
जब अधिकार छीने जाने की कोशिश होती है, तब टकराव अपरिहार्य हो जाता है।
अगर दबाव, डर या प्रशासनिक ताक़त के बल पर उन किसानों की ज़मीन पर कब्ज़ा करने की कोशिश की गई, जो अपनी ज़मीन नहीं देना चाहते, तो यह सिर्फ़ एक परियोजना नहीं होगी—यह दूसरा महाभारत होगा। इसकी ज़िम्मेदारी पूरी तरह सत्ता और प्राधिकरण की होगी।
यह भ्रम न पाला जाए कि नोटिस, फ़ाइलें और जेलें इस देश के किसानों की आवाज़ को दबा सकती हैं।
इस देश का किसान वही है जिसने अंग्रेज़ों के सामने सिर नहीं झुकाया।
और आज भी वह अपने हक़, अपनी ज़मीन और अपने सम्मान की रक्षा करना जानता है।
लेखक की टिप्पणी
यह लेख Jewar Airport के आसपास के गाँवों और सेक्टरों में हो रहे ज़मीन अधिग्रहण से जुड़े ज़मीनी अनुभवों और स्थानीय लोगों की बातों पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी को धमकाना नहीं, बल्कि सच को सामने लाना और जवाबदेही तय करना है।
डिस्क्लेमर
यह लेख लेखक के निजी विचारों और स्थानीय अनुभवों पर आधारित है। इसका उद्देश्य सूचना देना और जनहित में सवाल उठाना है, न कि किसी संस्था या व्यक्ति की छवि को नुकसान पहुँचाना।
✍️ AUTHER: ALOK SHARMA
(स्थानीय मुद्दों पर स्वतंत्र लेखन)


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